जिस तरह वो हैं ही नही

 जब वो मेरे साथ होती हैं तो बहुत कोशिश करती हैं अपने आप को सम्भालने की, लेकिन नही सम्भाल पाती। वो जब हँसती हैं तो बहुत हंसती हैं लेकिन फिर अचानक ही चुप भी हो जाती हैं। शायद उसे रोना आ जाता हैं और उसे रोना बिलकुल भी पसंद नही हैं। ये अलग बात हैं की वो एक बार चिल्ला चिल्लाकर रोना चाहती हैं।



मुझसे पूछो तो मैं तो येही कहूँगा, वो लड़की जो शरीर से बेहद कमजोर हैं, मन से उतनी ही कठोर और मजबूत हैं। उसके चेहरे पर एक अलग सी दर्द की नस हैं जो वो हमेशा छुपा कर रखती हैं। वो नस हमेशा ही मेरे आँसू के सामने कमजोर और बेचैन हो जाती हैं। पता नही कैसा रिश्ता हैं मेरी आँखों का उस नस से ओर उस नस का उन आँखों से की मेरा सारा दर्द उड़कर सीधा उसकी पलकों पर पंहुच जाता हैं।


वो सबके सामने कोशिश नही करती दर्द छुपाने की। क्यों की वो खुद को जीती ही नही कभी। लेकिन मेरे सामने वो वैसी नही रहती, जैसी वो हैं ही नही। वो बन जाती हैं ठीक वैसी, जैसी वो हैं। वैसे तो मेरे सामने भी वो मजबूत बनने की कोशिश करती हैं। खुद को सम्भालने की कोशिश करती हैं, लेकिन वो फिसल जाती हैं। उसकी हंसी के बाद की ख़ामोशी हमेशा मुझे बता देती हैं की अब बस एक लफ्ज काफी हैं रुलाने को।


उसका दिल, जो कब का हार चुकी हैं वो, मैं उसे जितना चाहता था। फिर जब मैं नही जीत पाया तो मैंने सबकुछ गँवाना ठीक समझा। लेकिन उसने फिर से समझदारी दिखाई। उसने उस हारे हुए दिल से भी मुझे सम्भाला। वो लडकी जो खुद को नही सम्भाल पाती, उसने हर एक रिश्ते को सम्भाला हैं। मैं सोचता हूँ कैसे सहन कर लेती वो सब..?


कभी कभी मुझे शर्म आती हैं खुद पर की मैं कितना कमजोर हूँ। उस लड़की ने पूरी दुनियाँ में से मुझे चुना था, मेरे सामने वो बिखरना चाहती थी, लेकिन मैं उसे समेट ही नही पाया। और उसे बिखरते हुए बस देखता रहा। हाँ मैंने उसे प्यार किया हैं मगर इतना काफी नही उसे सम्भालने को। जब वो बिखरती हैं तो मैं खुद को उस के साथ बिखर जाने देता हूँ क्यों की मैं और कुछ नही कर पाता।


वो लड़की जिसे मैं इतना अच्छे से समझता हूँ, मैं उसे सम्भाल नही पाता। क्यूँ की वो बस मेरे सामने ही जीती हैं और जी भर कर जीती हैं। ऐसा जीती हैं की मुझे लगता हैं वो इस तरह जियेगी तो मर जायेगी। लेकिन पता नही मुझे यकीन हैं की एक रोज मैं सिख जाऊंगा उसे सम्भालना। और फिर वो इस तरह जियेगी..


जिस तरह वो हैं ही नही।

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